जिंदगी की किताब
बड़ी कठिन और बेढब है जिंदगी की पाठशाला,
कभी मीठी, कभी तीखी, कभी बिल्कुल फीकी और कभी मिर्च मसाला.
स्कूल में गैरकानूनी है थप्पड़ और बेंत, 
पर हमें मार-मार कर हीं सिखाती है यह पाठशाला.
कितना छोटा दायरा और छोटी उम्र है इंसान की,
फिर भी इतने पाठ क्यों पढ़ाती है यह पाठशाला.
जब तक सीख और समझ न लो,
बार-बार पाठ दोहराती है पाठशाला.
फटी हुई किताब और कई पन्ने नदारद ऐसे में कैसे सिखाती है यह पाठशाला!
तक़दीर टीचर है और कितनी फटीचर.
तार तार पैरहन में आती है पाठशाला,
पूछो, गर सवाल तो, खड़ा करती है सर के बल,
उल्टी दुनिया को समझने के लिए उल्टी चलती है यह कार्यशाला.
बार-बार हमें ना पास कर आगे नहीं बढ़ने देती है पाठशाला
आज जिंदगी की शाम में फटी किताब और नोट्स को
सीने से लगा कर, फेरता हूँ यादों की माला.
धुंधली आंखों से पढ़ नहीं पाता, जिंदगी का आखरी पाठ
जिंदगी हो गयी बस, ठंढी चाय का प्याला.
सारे पाठ भूल गया हूं, रस्टीकेट होकर,
भीगी आंखों से कहता हूँ, अलविदा जिंदगी और तेरी पाठशाला
ईश्वर कहता है, 'कितने पन्ने छोड़े हैं मैंने कोरे'
तुझे ही तो रचना है जीवन काव्य सरस और निराला.

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