छलक उठी मैं

छलक उठी मैं
क्यों छलक उठी मैं आज, शर्म के पैमाने से,
मीठी ठोकर सी लगी है उनके आ जाने से |
कोई सूरत, कोई तदबीर नज़र नहीं आती, 
जो बचा ले मुझे यूँ घबराने से|
क्यों आये हो तुम, जब मैं 'कोयला भई न राख़',
तिल तिल कर जल रही थी, मैं ज़माने से|
मैं भी तो जलती हूँ, रोशन करती हूँ,
क्यों जलते हो मुझपे और मुझसे, शमा ने कहा परवाने से|
मेरी विरह की चिता पे, दो बूंद आंसू के,
टपका देना, पहले मेरे जल जाने से |
किसी वारिस शाह ने नहीं लिखी मुझ नामालूम हीर पे,
मेरी कहानी लिखी है खुद, बेवफा, मेरे रांझे ने|
जब मैं उठ गई हूँ खुद अब, ऊपर,
क्या होगा मेरी अर्थी को, फूलों से सजाने से?
शबे-गम की फ़िक्र क्यों करू मैं,
जब रूहानी बुलंदी मिलती है उनके तडपाने से |
आ जाना मेरी मय्यत पर किसी तरह,
शायद जी उठूं मैं आख़िरी बार, तुम्हें गले लगाने से|

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