तुम प्रकृति हो, मलिका- ए - कायनात
तुम प्रकृति हो, मलिका- ए - कायनात
हवा हो, मेरी सांसों की सौगात
झिंझोड़ती, कभी सहलाती हो
किन्तु मेरी बांहों में, नहीं कभी आती हो |
तुम धरती हो उर्वर और पर्वत भी
जीवन का सृजन कार हो तुम
खेतों की अमूल्य पैदावार हो तुम
वनवासी हो, वन की रानी हो, सजीला कुदरत भी |
तुम पानी हो, नदी, सागर, निर्झर
बरखा और बादल; तेरी आँखें, मेरे आंसूं से, क्यूँ जाती हैं भर?
लहरों के अनगिनत खेल खेलती हो
किरणों के संग मचलती फिरती हो |
तुम आग हो जीवन की ज़रूरी उष्मा
रोशनी को समर्पित शमा
आफताब हो और ज्वाला भी
नैनों की ज्योति हो और जीवन की दिव्य प्रभा |
तुम आसमान हो, अनंत विस्तार और आकाश
वक्त और फलक में ही सारी सृष्टि उगती है
कुदरत सुबह और शाम कितने रंगों में तुम्हें रंगती है
कभी हम तुम और सब खो जाते हैं, होता सिर्फ चिदाकाश !
तुम राधा- कृष्ण , देव- देवी और पार्वती शंकर
तुम अर्धनारीश्वर
और मैं? कहाँ रहा अब मैं?
हम सब न- कुछ और सब- कुछ, शून्य और अनंत, सृष्टि और ईश्वर |
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