कंटीला गुलाब यह सच है की तुम हो एक कंटीला गुलाब, रूप-रस-गंध मे ला ज़वाब। काँटों पे चल के पाया है तुम्हें, जैसे काँटों मे खिला शवाब। कैसे करुँ काबू अपनी तम्मना पर, जब की तुम खुद हो तम्मन्नाए बेताब। पता नहीं तुम ख़्वाब हो या हकीकत, सायद हो तुम हकीकत मे ढला ख़्वाब। कितनी चुभन हो तुम और कितनी रेशमी छुअन, कर नहीं पाया अभीतक इसका हिसाब। हर सवाल का जवाब भी होता है, दरअशल सही सवाल में ही छुपा होता है जवाब। गम के धुंधलके मे मुँह चिढ़ाता है आईना भी, तू क्यों चमक रहा है युं बेशरम माहताब? लाख कोशिश करता हुँ मगर, पढ़ नहीं पाता तेरे चेहरे की किताब। न साकी हैं, न मै, ना मय खाना, पिता हुँ, जो दिल मे ही खिचती हैं, वह शराब l
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